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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले को हिलाकर रख देने वाले 17.24 करोड़ रुपये के सर्पदंश मुआवजा घोटाले में पुलिस का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। सामान्य मौतों को कागजों पर सर्पदंश (सांप का काटना) दर्शाकर सरकारी खजाने में डाका डालने वाले इस नेटवर्क का पर्दाफाश होते ही अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और राजस्व कर्मचारियों समेत कुल 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
जांच में खुलासा हुआ है कि इस पूरे सिंडिकेट को 'एडवोकेट डायमंड गैंग' चला रहा था, जिसमें पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग के भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी एक कड़ी की तरह जुड़े हुए थे। जैसे ही अस्पताल में किसी मरीज की सामान्य मौत की सूचना मिलती, यह गैंग तुरंत एक्टिव हो जाता था। परिजनों की अज्ञानता का फायदा उठाकर या कई मामलों में उनकी जानकारी के बिना ही, महज 1.5 लाख रुपये में फर्जीवाड़े की 'सेटिंग' कर ली जाती थी और शासन से प्रति केस 4 लाख रुपये का मुआवजा वसूलकर आपस में बांट लिया जाता था।
इस पूरे फर्जीवाड़ा कांड की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए 431 फर्जी मामलों में 17.24 करोड़ रुपये की वित्तीय हेराफेरी का मुद्दा उठाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी रजनेश सिंह ने कमान संभाली और अब तक 14 अलग-अलग एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी हैं।
कार्रवाई की शुरुआत सिम्स की तत्कालीन महिला डॉक्टर प्रियंका सोनी की गिरफ्तारी से हुई, जिन्होंने फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार की थी। इसके बाद जांच की आंच तहसील कार्यालय तक पहुंची, जहां रविवार की छुट्टी के दिन सरकंडा पुलिस ने एसडीएम ऑफिस के बाबू नरेंद्र कौशिक, गरीब राम बिंझवार और तहसीलदार के क्लर्क हरिशंकर राठौर को गिरफ्तार किया, जिन्होंने अपनी सरकारी आईडी से फर्जी प्रकरण दर्ज किए थे। शिकंजा यहीं नहीं थमा, हाल ही में इस सिंडिकेट में शामिल दो पुलिसकर्मियों को भी सलाखों के पीछे भेज दिया गया है। फिलहाल, फर्जी रिपोर्ट जारी करने वाले सिम्स के कई अन्य डॉक्टर गिरफ्तारी के डर से फरार हैं, जिनकी तलाश में पुलिस जगह-जगह दबिश दे रही है।
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