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रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित है। इस दिन विधिपूर्वक सूर्य देव की पूजा उपासना और उपाय आदि से व्यक्ति को सभी कार्यों में सफलता मिलती है। साथ ही, नौकरी और व्यापार की समस्याएं दूर होती हैं।
हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित है. रविवार का दिन सूर्य देव की पूजा-उपासना का विधान है. हिंदू धर्म में कहा गया है कि इस दिन विधिपूर्वक अगर सूर्य देव की पूजा की जाए, या फिर उन्हें अर्घ्य दिया जाए, तो वे जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और व्यक्ति की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रविवार को श्री सूर्योष्टकम् का पाठ करना विशेष लाभदायी होता है.
मान्यता है कि रविवार के दिन सूर्योष्टकम् का पाठ करने से व्यक्ति को तुरंत फल मिलता है. नौकरी और करियर आदि में आ रही समस्याएं भी इस पाठ से तुरंत दूर हो जाती हैं. व्यक्ति पर कोई संकट नहीं आता. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आप भी नौकरी और करियर से संबंधी कोई समस्या से गुजर रहे हैं, तो कम से कम 7 रविवार लगातर श्री सूर्योष्टकम् का पाठ करना चाहिए. इससे व्यक्ति का कल्याण होता है. रविवार का दिन इन सभी कार्यों के लिए अच्छा होता है.
सूर्योष्टकम् पाठ की सही विधि
अगर आप भी श्री सूर्योष्टकम् पाठ करने की सोच रहे हैं, तो उससे पहले पाठ करने की सही विधि जान लें. पाठ करने से पहले व्यक्ति को स्नान करना चाहिए. स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें. जल में अक्षत, लाल चंदन, फूल आदि मिला लें. सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करने के बाद आसन पर बैठ जाएं, सच्चे मन से श्री सूर्योष्टकम् का पाठ करें. इससे आपकी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. ये पाठ करते समय सही उच्चारण करना चाहिए.
श्री सूर्याष्टकम् पाठ
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥1॥
सप्ताश्व रथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्।
श्वेत पद्माधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥2॥
लोहितं रथमारूढं सर्वलोक पितामहम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥3॥
त्रैगुण्यश्च महाशूरं ब्रह्माविष्णु महेश्वरम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥4॥
बृहितं तेजः पुञ्ज च वायु आकाशमेव च।
प्रभुत्वं सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥5॥
बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम्।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥6॥
तं सूर्यं लोककर्तारं महा तेजः प्रदीपनम् ।
महापाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥7॥
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानप्रकाशमोक्षदम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥8॥
सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडा प्रणाशनम्।
अपुत्रो लभते पुत्रं दारिद्रो धनवान् भवेत्॥9॥
अमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने।
सप्तजन्मभवेत् रोगि जन्मजन्म दरिद्रता॥10॥
स्त्री-तैल-मधु-मांसानि ये त्यजन्ति रवेर्दिने।
न व्याधि शोक दारिद्र्यं सूर्य लोकं च गच्छति॥11॥
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