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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक अहम फैसले में साफ किया है कि सगे भाई-बहनों के बच्चों के बीच विवाह प्रतिषिद्ध नातेदारी में आता है और कानूनन शून्य है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ “परंपरा” का हवाला पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे प्राचीन, निरंतर प्रचलित और कानून के अनुरूप साबित करना जरूरी है।
मामला जांजगीर-चांपा जिले का है, जहां 20 अप्रैल 2018 को हुई एक शादी को लेकर विवाद सामने आया। पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की। उसका कहना था कि उसकी मां और पत्नी की मां सगी बहनें हैं, यानी दोनों मौसी के बच्चे हैं—जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 (iv) के तहत प्रतिबंधित संबंध में आता है।
फैमिली कोर्ट ने पहले यह मानते हुए विवाह को वैध ठहराया था कि पटेल समाज में “ब्रह्म विवाह” के रूप में ऐसी शादियों की परंपरा है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी भी प्रथा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है जब यह साबित हो कि वह प्राचीन हो, लगातार पालन में रही हो और सार्वजनिक नीति के खिलाफ न हो। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसी कोई ठोस परंपरा साबित नहीं की गई।
शादी शून्य, फिर भी भत्ता मिलेगा
अदालत ने विवाह को शून्य घोषित करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इससे पीड़ित पक्ष के अधिकार समाप्त नहीं होते। पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता की हकदार रहेगी।
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20 Feb 2023
20 Feb 2023