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मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार को 19 महीने हो चुके हैं, लेकिन मंत्रिमंडल का विस्तार अब तक अधूरा है। फिलहाल केवल 11 मंत्री ही काम देख रहे हैं, जबकि संवैधानिक सीमा के अनुसार 14 मंत्री बनाए जा सकते हैं। यानी 3 पद खाली हैं और इसी वजह से कई अहम विभाग मुख्यमंत्री के पास हैं। खनिज, ऊर्जा, परिवहन, आबकारी जैसे बड़े विभाग खुद मुख्यमंत्री संभाल रहे हैं, लेकिन बोझ अधिक होने से विभागीय कामकाज धीमा पड़ गया है। ट्रांसफर पॉलिसी 2025 में विभागीय मंत्रियों की स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई है, मगर जिन विभागों में मंत्री ही नहीं हैं वहां आदेश पेंडिंग पड़े हैं।
राजनीतिक खींचतान भी विस्तार की राह में सबसे बड़ी बाधा है। पुराने और नए विधायकों के बीच मंत्री बनने की होड़ जारी है। सरगुजा, बस्तर और मैदान क्षेत्र के साथ ओबीसी, एसटी, एससी और वैश्य समाज का संतुलन साधना भी पार्टी के लिए चुनौती बना हुआ है। भाजपा के भीतर गुटीय खींचतान, खासकर रमन सिंह और अमर अग्रवाल समर्थित धड़ों के बीच शक्ति संतुलन, फैसले में देरी का अहम कारण माना जा रहा है।
इस देरी का असर सीधे प्रशासनिक कामकाज पर दिख रहा है। परिवहन, खनिज और ऊर्जा विभागों से जुड़े टेंडर और मंजूरियां लंबे समय से लटकी हुई हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं की मॉनिटरिंग सुस्त हो गई है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने कैबिनेट विस्तार को टालमटोल कर गवर्नेंस को अधर में डाल दिया है।
संवैधानिक प्रावधान के मुताबिक 90 सदस्यीय विधानसभा वाले छत्तीसगढ़ में अधिकतम 14 मंत्री बनाए जा सकते हैं। यानी 3 पद तुरंत भरे जा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब कैबिनेट विस्तार केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं बल्कि राजनीतिक मजबूरी भी है, खासकर आगामी नगरीय निकाय चुनावों से पहले भाजपा को संगठन और शासन दोनों स्तर पर मजबूती दिखाने के लिए।
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